शनिवार, अक्तूबर 13, 2012

वेश्याओं से बदतर इन्होने आत्मा बनाली है,

वन्दे मातरम दोस्तों,
अधिकांश नारियां मजबूरी वश,
देह व्यापार करती हैं,
कुछेक स्वेक्षा या शौक या पैसे की खातिर.
इस धंधे में उतरती है,
मगर
धंधे के वक्त ना सही,
शर्म तो फिर भी,
इन बेशर्मों में होती है,
तन्हाई में जब सोचती हैं ये,
इनकी अंतरात्मा,
जार जार रोती है.
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सरकार में बैठे मेरे अजीज नेता,
इन वेश्याओं से भी,
गए गुजरे हैं,
सीड़ियों पर बैठे वो दल्ले और भडवे,
इन सफेद पोश लोगों से,
ज्यादा उजरे हैं,
वो करती तन का सौदा,
संतुष्टि ग्राहक की,
मन में उनके मैल होता शायद नही,
ये उजले कपड़े पहन कर वोट मांगते मगर,
गंदगी इनके ज़हन चार सू है बसी,
वोट जिसने दिया
उसकी इनको फ़िक्र कब,
कम्पनियों की ये करते दलाली हैं,
देश जाये भाड़ में
जनता मरती मरे,
वेश्याओं से बदतर इन्होने आत्मा बनाली है,
वो पैसे लेती मगर अपना करती हैं,
वोट पाकर फ़िक्र इन्हें कब
जनता भूखी मरती है,