रविवार, जुलाई 08, 2012

तुझे कैसी शर्म और कैसी हया,

मनमोहन जी के लिए
मैडम के तिरछे जो नैन हो गए,
सहाब एक दम बैचेन हो गये,
खुश करने मैडम को तरकीब लगाई,
महंगाई से गरीब की कुटिया जलाई,
इनके तमाशों के हैं जनपथ पे चर्चे ,
खुशियों की खातिर नयन गरीब के तरसे,
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शीला जी के लिए
नयनो में आंसू दे डाले, बिजली ने दिल्ली वालों के,
मकान से महल बने, सत्ता के दलालों के,
पेट्रोल के आंसू नयनों से, अब तक सूख ना पाए हैं,
जल निजीकरन के आंसू, अब नयनों में छाए हैं,
मेरी दिल्ली मेरी शान,
गरीब की ले लेगी जान,
मेरे तो नयनों में अब, आंसू भी ठहर ना पाते हैं,
पेट भरेगा
शुबह कैसे, ये ही स्वप्न सताते हैं. ...................................................................
नालायक के लिए
तुझे कैसी शर्म और कैसी हया,
लाज लिहाज तू करेगा क्या?
तेरे नयनो का पानी मर जो गया,
तुझे कैसा डर और कैसी सजा?
तेरी आँख का पानी मर जो गया