बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

****एक व्रक्ष की व्यथा***

मुझे मत काटो, मुझे बड़ने दो,
अपने बालक सा पलने दो ............

जेठ की तपती दुपहरी में, तुमको छाया शीतल दूंगा,
तुम्हारी उदर क्षुधा करने को शांत,तुमको बहुत से फल दूंगा,
"फूल" देवों के शीस चढ़ाने को, दुल्हनिया को खूब सजाने को,
बुढ़ापे में तुम्हे चलने को, मजबूत बहुत संबल दूंगा,
तुम खुद फलना गर चाहते हो,तो मुझको भी तो फलने दो,
मुझे मत काटो, मुझे बड़ने दो,
अपने बालक सा पलने दो ............

में खत्म तुरंत हो जाऊँगा, कुछ पल में ही दावानल में,
धरती को जकड़ के रखा है, मैंने हर पल ही अपने बल में,
मेरी हरियाली देख कर आता है, मेघा उमड़-घुमड़ कर छाता है,
मुझे गर यूं काटोगे, मिटाओगे, धरा रेगज़ार बनेगी कुछ पल में,
मेरी रक्षा तुम करो सदा, मुझे इस तरहा ना जलने दो,
मुझे मत काटो, मुझे बड़ने दो,
अपने बालक सा पलने दो ............

मुझे इस तरहा जो मिटाओगे, तुम खुद भी तो मिट जाओगे,
जीवन को बचाने की खातिर, वनोषधि कहाँ से लाओगे,
सुनो तुम्हे चेताता हूँ, एक सच्ची बात बताता हूँ.
मेरा जब भी तुम करोगे कत्ल, एक नई सुनामी पाओगे,
मेरी कमी तुम मेरी जननी, धरती माँ को मत खलने दो,
मुझे मत काटो, मुझे बड़ने दो,
अपने बालक सा पलने दो ............

हम हरे भरे पर्वत छूते, और फल फूलों से लदे हुए,
हम मानवता के सजग प्रहरी, करते विषपान सधे हुए,
हम धरा का आभूषण, दूर सदा करते प्रदूषण,
तुम उनको काटा करते है, जो सर हाथ तुम्हारे धरे हुए,
आने वाली नव पीढ़ी को, तुम मेरी कमी ना सलने दो,
मुझे मत काटो, मुझे बड़ने दो,
अपने बालक सा पलने दो ............