शनिवार, जनवरी 29, 2011

***कितने "सोनवाणे" की लाशे, कांधे हमे उठानी होगी***

वन्दे मातरम बंधुओं,


ईमानदारी को जिन्दा, जलावन हार हैं जो दोस्तों,
कुत्ते की मौत मरने के, हकदार हैं वो दोस्तों.............

अपने हाथों में जलाते, सत्य की जो हैं मशाल,
सत्य को निज कर्म में, जो सदा रखते संभाल,
सत्ता और प्रशासन को, लगते हैं वो शूल से,
बेईमानी के इस जंगल में, आ गये वो भूल से,
सच की करते जो बातें, बेकार है वो दोस्तों,
आदमी को जो मौत दे, व्यापर है वो दोस्तों ..............

राजनीती में घुसे माफिया, सफेद खादी धार कर,
जिन्दा जलाने सत्य को, मिलावट का व्यापर कर,
इनका मतलब है केवल, सत्ता पर रहना आसीन,
पैसे की खातिर ये, भूल चुके दुनिया और दीन,
जो इनकी करे खिलाफत, गद्दार है वो दोस्तों,
ईमानदारी जिनके खूँ में, बीमार है वो दोस्तों............

आज गिद्ध नजर आते नही, आकाश में मेरे देश के,
हाँ इनकी आत्मा जिन्दा है, सफेद खादी के भेष में,
कितने "सोनवाणे" की लाशे, कांधे हमे उठानी होगी,
सच्चाई की अर्थी कब तक, अपने हाथ सजानी होगी,
दुनिया को बदलता जो, विचार है वो दोस्तों,
क्रांति की बजाती रणभेरी, पुकार हैं वो दोस्तों ..............