शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

***है प्रेम की पराकाष्ठा, माँ मेरी और माँ तेरी****

***है प्रेम की पराकाष्ठा, माँ मेरी और माँ तेरी****

प्रेम करना है तो सीखो आसमां से, कुछ ये दोस्त,
सब के सर पे एक सी, चादर है उसने तान दी..........
बेजुबां पतंगे ने हमको, प्रेम करना है सिखाया,
इश्क शमां से है इतना,  जलकर के उसने जान दी.........
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सूरज ने हमको सिखाया, जलादो खुद को मगर,
एक सा सारे जहाँ को, आभा दो प्रकाश दो............
तोता मैना से भी हमने, बहुत कुछ सीखा है दोस्त,
है जीवन तो मतभेद होगा, जीवन को मगर विश्वाश दो.............
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फूल ने खिल कर सिखाया, दोस्त दुश्मन कोई नही,
मुझसे ही जयमाल बनती, मुझको ही अर्थी चडाते...............
पाक गंगा में है जो नीर, है वही तो आबे -जम- जम,
जीने को गर है जरूरी, मुर्दे भी उसमे नहाते ...........
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बहती हुई ये पवन कब, भेद करती तुझमे मुझमे,
धरा, गगन के बीच सबको, प्रेम एक सा दे निरंतर................
चाँद जब निकला किया, उसकी पवित्र शीतलता,
सबको मिलती एक सी, हो आदमी या जानवर...........
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है प्रेम की पराकाष्ठा, माँ मेरी और माँ तेरी,
नौ माह रखती कोख में, हमको जीवन दान देती..........
पूत सपूत है या कपूत, जानती है फर्क बेशक,
पर दोनों में भेद ना कर पाती, प्रेम एक समान देती.........
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प्रेम को गर जानना है, जान लो ईस्वर को दोस्त,
अपनी रहमत एक सी, सब पर लुटाता है सदा..............
प्रेम भेद नही करता है, जात पात न जाने प्रेम,
प्रेम की है पाकीजगी, बंदे को कर देती खुदा ...........