गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

""मेरी साँसों में शुमार है तू"

वन्दे मातरम दोस्तों,

जीवन का पहला प्यार है तू,
खुशियाँ महकाती बहार है तू ..........
बेशक तू मेरे पास नही पर,
धडकन में शामिल यार है तू............
तेरी पाकीजगी अब तक जिन्दा है,
मेरी साँसों में शुमार है तू..........
बेशक तू दुनिया छोड़ गई,
पर मेरा सारा संसार है तू.........
तेरी बात चली तो इतना ही कहूँ,
मेरा गुल, गुलशन, गुलजार है तू .........
थोडा ही दिया कुदरत ने मगर,
अनमोल मुझे उपहार है तू..........
जेठ की तपती दुपहरी में,
शीतलता भरी बयार है तू ........
मैं ता जीवन तुझको याद करूं,
बेशक इसका हकदार है तू ...........
मेरी ये रचना मेरे उस दोस्त उस प्यार को समर्पित है... मैं जिसके साथ खेला, पड़ा, बड़ा हुआ...... जिसके साथ सारा बचपन गुजारा........ हम कब जवानी की दहलीज पर आ गये पता ही नही चला, ना उसने कुछ कहा न मैंने......... पता तो तब चला जब हम अपने परिवारों के सामने खड़े हो गये......... हमारे पास मौका भी था और हालात भी ......... मगर हमारे संस्कार इसकी इजाजत नही दे रहे थे की हम अपने घर वालों का सर नीचा कर कहीं दूर चले जाए......... उसकी तम्मना थी की उसकी डोली सामजिक रीती रिवाजो के साथ मेरे घर पहुंचे........ उस समय ओनर किलिग़ नाम का कोई शब्द नही था........ मगर हालातों ने हमे जुदा कर दिया......... वो इस जुदाई को सह नही सकी और इस दुनिया से दूर चली गई........... शायद मैं इतना संग दिल था की उस हादसे के 24 साल बाद भी आज तक उसकी याद लिए जी रहा हूँ.......... कहते हैं वक्त सभी गम भर देता है........ मेरे जीवन मैं भी आज उसकी बातें मुझे याद आकर जीवन को नये तरीके से जीने के लिए प्रेरित करती हैं ................