गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

***अब प्यार हवस की हरारत हुई है***

प्रीत कभी इबादत थी यारों,
आज मगर वो तिजारत हुई है,
सागर से ज्यादा थी जिसकी गहराई,
फक्त आज वो एक शरारत हुई है................
कुर्बानियों से भरी दास्ताँ है जिसकी,
चंद पैसों में बिकती वजारत हुई है,
वफा की बाते, कसमे ओ वादे,
इसमें हासिल सभी को महारत हुई है............
शर्म, लाज और प्यार पर मरना मिटना,
कहीं दूर जाकर के गारत हुई है,
जब होगी तब होंगी, प्यार वफा की बाते,
अब प्यार हवस की हरारत हुई है....