शनिवार, दिसंबर 04, 2010

***प्यार का तोहफा, केवल लाल गुलाब था,****

वन्दे मातरम दोस्तों,

भौतिकता के इस युग में,भौतिक हो चला प्यार भी,
पहले प्रीत ओ प्रीतम था चाहिए,अब कोठी, बेंक बैलेंश, कार भी..........

परदेशी सजना जब, लौटेगा अपने घर पर,
बाँहों का वो हार पहना,छाएगा मन मन्दिर पर,
आज कहाँ वो गलबैयां,ये चीज बड़ी बेकार की,
उसके आते सबसे पहले, पकड़ें राह बाजार की.........

पहले तो बस प्यार का तोहफा, केवल लाल गुलाब था,
अधरों, पर एक प्यारा चुम्मन, सबसे बड़ा ख़िताब था,
आज दे सको ना पजेरो, मर्सडीज, सबसे बड़ी हार है,
अब आत्मा का प्यार नही, केवल पैसा का प्यार है.........

सौ रूपये का मजदूर, लौट के घर जब आता है,
रात को सोते समय, जब पत्नी की बाँहों में समाता है,
महलों में है मरग त्रष्णा, गरीबों में सपने अब भी प्यार के,
झोपड़ियों में जिन्दा आज भी, सम्वेदन, अपने प्यार के..........