बुधवार, दिसंबर 01, 2010

वन्दे मातरम दोस्तों,
प्रेम के अनेको रूप है, एक कोशिश मै अपनी इस कविता में प्रेम के उस तुलनात्मक रूप में करने की कर रहा हूँ जो मेरे समय या उससे भी पहले था......... और एक प्रेम जो आज की पीड़ी का है.........

""सालों की चाहत के बाद,बन सके हम हम सफर""

एक प्यार था वो जब की हम, सालों इंतजार किया करे,
तुझे पाने की चाह में, जहर जुदाई का पीया करे...........
सालों की चाहत के बाद, बन सके हम हम सफर,
जिन्दगी गुजर गई, पर साथ ना छूटा मगर.........
भरपेट जब खाना नही और, हाथ था जब बहुत तंग,
फाकों की आई नौबते, वो वक्त भी गुजारा संग.............
साथ बस टूटा तभी, जब साथ छोड़ी जिन्दगी,
हाथ बस छूटा तभी, जब हाथ छोड़ी जिन्दगी..........
तब प्यार का मतलब ही था, उम्र भर का साथ साथी,
जिन्दगी थी साथ ऐसे, जैसे दीप और बाती............

""एक नये प्यार की तलाश में, तलाक का कर लिया वरण""

आज प्यार के ये दोस्त, माइने बदले मगर,
कब जुड़ा, कब टूट गया, जिन्दगी का ये सफर********
एक मुलाक़ात और, सैकड़ों वादे हुए,
साथ ना छूटेगा कभी, पत्थर से अटल इरादे हुए*******
मर्यादा सभी लांघ किये, शादी से पहले ही हम,
बर्बाद कितने हो गये, शादी से पहले ही हम*************
चार मुलाक़ात और, शादी किये हम शान से,
साथ चले चार कदम, तो विनती किये भगवान से*********
सुन खुदा, मेरी सदा, इस मुश्किल से छुटकारा दिला,
ये कहाँ मैं फंस गया, इससे अकेला था भला************
लाखो रुपये है आमदनी, और सुविधाओं की कमी नही,
दिखावा प्यार का बहुत, पर भावनाए कही नही**********
साल भर ना साथ रहे, कोर्ट की ले ली शरण,
एक नये प्यार की तलाश में, तलाक का कर लिया वरण********

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