शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

****एक मजदूर की दिवाली****

****एक मजदूर की दिवाली****

त्योहारों के रंग में डूबा सारा शहर है,
बदरंग बहुत मगर मेरा ही घर है,
जो मिलती मुझे मजूरी है,
होती घर की जरूरत नही पूरी है,
पटाखे लाऊं कहाँ से?
कपड़े दिलाऊँ कहाँ से?

बच्चों का पेट भर पाता नही हूँ,
शर्म के मरे घर जाता नही हूँ,
जो मिलता मेहनताना है,
मुश्किल घर चलाना है,
मिठाई लाऊँ कहाँ से ?
दिवाली मनाऊँ  कहाँ से ?

दिल में मेरे खालीपन,
और जेब  भी खाली है,
अपना तो दिवाला है,
बेशक तेरी दिवाली है,
रंगोली सजाऊँ कहाँ से?
दीप जलाऊँ कहाँ से?