शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

***आतंक मुक्त होकर आखिर,हम कब दिवाली मनाएंगे?***

वन्दे मातरम दोस्तों,
१९८४ के दंगों के बाद दिवाली के मौंके पर मेरे किशोर मन से एक टूटी फूटी कविता बन पड़ी थी, इस कविता का मैंने १९८९ मैं अपने कालेज दयाल सिंह के सालाना उत्सव मैं प्रथम बार कविता पाठ किया, उसके बाद देहली में दिवाली से पूर्व हुए बम धमाकों पर इस कविता में चंद लेने और जोड़ी गई, आपके सम्मुख है.............

आतंक मुक्त होकर आखिर,हम कब दिवाली मनाएंगे?............ 

बड़ी ख़ुशी ख़ुशी यारों, हमने दिवाली मनाई है,
घर मैं घुसे तो सन्न रहे, एक लाश पड़ी पाई है,..........
लाश जो मेरी अपनी है, है मेरे अरमानों की,
लाश जो बुजर्गों की है, है नये नये मेहमानों की,...........
लाश जिस पर बैठा है, काला नाग फन फैलाये हुए,
एकता, अखंडता, अमन, चैन, शांति को खाए हुए,.............
लाश जो हमको दे रही, हमारे घर मैं ही गाली है,
तुम जब तक जागोगे नही, हर दिवाली ही काली है,.............
लाश जो दिवाली से पहले, मेरे घर में आई है,
दिवाली के दिन भी दुश्मन, भाई का भाई है,............
आतंक की काली छाया मैं, कैसे दिवाली मनाई जाएगी,
लाश ये अपनी अपने काँधे, कब तलक उठाई जाएगी,............
कब तक नफरत के नाग, हमे यूँ डसते जायेंगे,
आतंक मुक्त होकर आखिर,हम कब दिवाली मनाएंगे?............