मंगलवार, अक्तूबर 19, 2010

***वतन पर जो फ़िदा होगा अमर वो नौजवां होगा***

***सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुये कातिल में है,
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ये आसमां,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है,
ये शहीदे - मुल्को -मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है.***



***शहीदों की चितायों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वोलों का यही वाकी निशाँ होगा,
वतन पर जान देने की जिसके मन में है कुब्बत,
वतन पर जो फ़िदा होगा अमर वो नौजवां होगा,***



सर जॉन साइमन को ३० अक्तूबर १९२८ को भारतीय राजनीतिक उथल - पुथल पर रिपोर्ट बनाने के लिए लाहौर भेजा गया, उस समय भारतीय राजनैतिक लोगो ने साइमन कमिशन
का विरोध किया क्योंकि इसमें एक भी भारतीय को शामिल नही किया गया था, लाला
लाजपत रॉय ने साइमन कमिशन का अहिंसक विरोध प्रदर्शन का नेतर्त्व किया मगर
पुलिस ने हिंसा का सहारा लिया, उस हिंसक लाठी चार्ज में सेकड़ों लोगों के
साथ लाला जी की भी शहादत मिली, भगत सिंह जो इस घटना के चश्मदीद थे
उन्होंने उसी समय इस घटना के लिए जिम्मेदार पुलिस प्रमुख जनरल स्कॉट को
जान से मार डालने की कसम खाई, भगत सिंह ने शिव राम राजगुरू, शुखदेव थापर व
जय गोपाल के साथ मिलकर जनरल स्कॉट को जान से मारने के लिए योजना बनाई मगर
गलत पहचान होने के कारण उनके दुयारा किये गये गोली कांड में जनरल स्कॉट की
जगह सांडर्स मारा गया,
पुलिस को और अधिक शक्ति देने के मकसद से ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश भारत सरकार अधिनियम को लागु किया गया हालाँकि यह
अधिनियम कोंशिल में एक वोट से गिर गया मगर दावा किया कि यह अधिनियम जनता
के हित में है इस लिए ताना शाही रवैया अपनाते हुए इसे पारित किया गया. इस
अधिनियम के विरोध में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने विधान सभा में बम
फैका, और भर्ती आजादी के लिए पर्चे फैंके और इस सब के बाद भी ये बहादुर
भागे नही बल्कि इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगते रहे ,
पुलिस ने इन्हें पकड़ा, इन पर मुकद्दमा चलाया गयाऔर जबरदस्ती इन पर देश द्रोह का इल्जाम
लगते हुए इन्हें जेल भेज दिया गया, जेल में भी ये अम्र क्रन्तिकारी आराम
से नही बैठे इन्होने भूख हड़ताल का सहारा लिया.
अंग्रेज पुलिस इन क्रांतिकारियों की बदती लोकप्रियता व आजादी के लिए बड़ते जूनून से बेहद ही
परेशान थी वह किसी भी कीमत पर आजादी के आन्दोलन का सर कुचलना चाहती थी,
23 मार्च 1983, भारतीय इतिहास का एक काला पन्ना, अंग्रेजों ने आनन फानन में
सभी नियम व कायदे कानून को टाक पर रखकर भगत सिंह, सुखदेव और राज गुरू को
समय पूर्व फांसी पर लटका दिया, ये अंग्रेजो का डर था और इन महान क्रांति
कारियों की लोक प्रियता की पराकाष्ठा थी ये,अंग्रेज जानते थे की समय पर
दिन के उजाले मैं इन्हें फांसी देना किसी तरह आसान नही था, आजादी के ये
मतवाले हंसते - हंसते फांसी पर लटक गये कोई दर्द, कोई दुःख नही था उन्हें,
केवल ये तमन्ना थी की दोबारा जन्म लेकर भी वो भारत माता की सेवा करें,
होटों पर था तो केवल एक गीत
आज एक महान अवसर है हमारे महान क्रांतिकारियों के महान शहीद दिन के 80 वीं वर्षगांठ, सरदार भगत सिंह,
सुखदेव और राजगुरु ऐसे निडर देशभक्त, जो आदर्शवाद और वीरता में अतुलनीय थे
उनकी शहादत दुख का दिन नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय गौरव और सम्मान का दिन
है. आइये इन महान शहीदों की शहादत के इस पावन पर्व पर हम सभी भारत वासी
कसम उठाएं की जिस आजादी के लिए ये शहीद हंसते हंसते फांसी चढ़ गये उस
आजादी की रक्छा के लिए हम भी अपने प्राणों की आहुति देते हुए हिचकेंगे
नही. और अपनी आजादी से किसी देसी या विदेशी को खिलवाड़ नही करने देंगे,आज
शहीद दिवस है कितना कुछ उन शहीदों ने देश के लिए किया, कितना कुछ हम उनके
लिए कहना चाहते हैं, आओ आज इस पावन दिवस पर हम संकल्प ले की हम केवल उनके
कहे को, उनके करे को, केवल शब्दों से ही महिमा मंडित नही करेंगे बल्कि
उसको आचरण में भी उतारेंगे.

""जय हिंद, जय भारत""