बुधवार, अक्तूबर 20, 2010

***रूहे शहीदा शर्मिंदा हैं***



""आजादी खुद पर शरमाई,
वक्त ने ली कैसी अंगडाई,
रूहे शहीदा शर्मिंदा हैं,
जिन्दगी किस दौर पे आई""

क्या इसीलिए हम फांसी चढ़ गये ,
क्या यही स्वप्न हमारा था,
तुम लूट लूट कर इसको खाओ,
जो हमे जान से प्यारा था,

तुम लालकिले फहराने तिरंगा,
सुरछा गार्डों के संग आते,
देश की खाक हिफाजत करोगे,
अपनी जान बचा नही पाते हो,

उग्रबाद के आगे टेकते घुटने,
तुम्हे जान आन से प्यारी है,
खुद को समझते देश से ऊपर,
इसलिए ही हार तुम्हारी है,

बेबस क्यों लाल भूमि के, शत्रु क्यों हो रहा दबंग???

क्योंकि देश पे मर मिटने की अब, नेताओं मैं नही उमंग,

लाल किले पर तिरंगा, फहराओ तुम शान से,
इतना प्यार मत करो, अपनी इस जान से,

अगर मौत भी आये तो, इक मिशाल बन जाओ तुम,
तुम भारत माँ के हो सपूत, धरा गगन पर छाओ तुम,

फिर कोई रूबिया प्रकरण, दौहराया ना जो जायेगा,
उग्रवाद इस देश से, तब ही तो मिटने पायेगा,

देश द्रोही को मारने मैं, मिनट ना एक बर्बाद करो,
आजादी की खातिरफांसी चढ़ गये, इतना तो तुम याद करो,


शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा था -‘‘भारतीय मुक्ति संग्राम तब तक चलता रहेगा जब
तक मुट्ठी भर शोषक लोग अपने फायदे के लिए आम जनता के श्रम का शोषण करते
रहेंगे। शोषक चाहे ब्रिटिश हों या भारतीय।


जो देश पे मिटना जानते थे,
वो देश पे मिटके दिखा गये,
अब दूसरों को मिटाना जान गये,
आज के दौर के नेता नये,

जो देश प्रेम की जिद रखते,
और देश पे मिटना चाहते हैं,
उन नौजवानों को ये नेता गन,
आपस मैं ही लड़वाते हैं,

जो फांसी के फंदे पर, हंसते हंसते झूल गये,
आज उन्ही के वंशज, उनकी शहादत भूल गये,
23 मार्च या 11 अगस्त की, कहाँ कोई करता है याद,
ये देख शहीदों की रूहे भी, होती तो होंगी नाशाद,