मंगलवार, अक्तूबर 19, 2010

***जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है***

जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है***
ये टुकड़ों मे घर की कहानी के किस्से***
ये दुकानों मे बिकते जवानी के हिस्से***
यूँ खूं मे बड़ा फ़र्क होता कंहाँ है***
तू हिंदू यहाँ हैं, तो मुस्लिम वहाँ हैं***

क्यूँ चिंगारियों मे मेरा घर जला है***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं***

ये काजी भी पंडित भी खंजर लिए हैं***
यूँ इन्सा की धरती को बंजर किए हैं***
मोहब्बत की हरदम सुनी जो कहानी***
वो बचपन मरा, मर चुकी है जवानी***

ये दामन उम्मीदों का कट फट चुका है***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं***

ये बीमार बैलों की गाड़ी रुकी सी***
ये नभ के खजानों की थैली चुकी सी***
ये धरती के बेटों की गीली निगाहें***
उठाए ज़मीन अपनी सूखी सी बाहें***

वो मजबूर अब खो गया आसमाँ में***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है***

ये सड़कों पे घुट घुट गुज़रती सी रातें***
ग़रीबी के गलियों मे खुलते हैं खाते***
ये नुक्कड़ पे लुटती हुई कोई इज़्ज़त***
ये सजती हुई भूख से कोई मैय्यत***

न कंबल मिला, न कफ़न ही मिला है***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं***

ये नफ़रत का जहर उगलती ज़बानें***
ये हिन्दी, मराठी पे कटती ज़बानें***
ये दहशत के रंगों से सड़कें सजी जो***
ये सडकों पे कितनी ही लाशें सड़ी जो***

ये धरती लुटी, आसमाँ भी फटा है***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है***

सपोले यूँ कुर्सी से चिपके हुए हैं***
वो ठंडे मकानों मे डुबके हुए हैं***
अमीरों की गलियों मे सूरज खिला है***
ग़रीबों को बस ये अंधेरा मिला है***

सिसकती फटे हाल हो, अपनी माँ है***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है***

मुहाफ़िज़ बने हिंद के उनको लाओ***
ये तस्वीर जलती उन्हे भी दिखाओ***
जलाना ही है उन्हें आज जलाओ***
क्या होता है दर्द ये उन्हें तुम दिखाओ***

सुलगते सुलगते चमन जल चुका है***
जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है***





यह कविता 'प्यासा' फिल्म के गीत 'जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं ' से प्रेरित है...उम्मीद है आपको पसंद आएगी....ये कविता साहिर लुधियानवी जी की लिखी है हाँ मैंने जरूरत के मुताबिक संशोधन अवश्य किया है***
साहिर लुधियानवी जी व भाई दिलीप जी से साभार***