मंगलवार, अक्तूबर 19, 2010

***युद्ध "समझौता" युद्ध विराम****

वन्दे मातरम दोस्तों,

***जिसे नही निज धर्म का निज देश का अभिमान है,
वो नर नही है निरा पशु है और मिरतक समान है,***

एक छोटा सा देश जो कभी हमारा ही एक भाग होता था धर्म के नाम पर हमसे अलग हुआ उसने अपना नाम रखा पाकिस्तान, पाक यानि पवित्र,यानि वो जगह जहाँ पवित्रता होनी चाहिए थी.
मगर हुआ उसका उल्टा ही वो देश अंदरूनी कलहो में उलझा रहा और उस और से अपनी अवाम का दिमाग हटाने के लिए उसने भारत पर एक युद्ध थोप दिया मगर हुआ क्या वो हरा, कुछ दोस्तों ने मिलकर इस युद्ध की खटास को दूर करने की कोशिश की दोनों देशों को शान्ति को शान्ति वार्ता के लिए तैयार कर लिया, शान्ति हुई भी मगर कितने दिन कुछ साल बाद फिर दोनों देश एक युद्ध में उलझेफिर वही अंजाम हुआ पाकिस्तान फिर परास्त हुआ हम फिर शान्ति वार्ता को तैयार हुए फिर वही शान्ति का राग अलापा गया फिर युद्ध विराम हुआ, (युद्ध "समझौता" युद्ध विराम) पहले युद्ध से लेकर कारगिल तक यही होता रहा, युद्ध होते रहे पाकिस्तान हारता रहा, मगर इस से ना पाकिस्तानी हुक्मरानों ने सबक लिया ना ही भारतीय कूट नीतिज्ञो ने, क्योंकि हर युद्ध का अंजाम चाहे कुछ भी हो, कोई भी पाकिस्तानी हुक्मरान या भारतीय कूट नीतिग्य इन युद्ध में नही मारा गया, दोनों ही देश के सर्वे सर्वा ये भूल गये कि एक युद्ध हमे सालो पीछे ले जाता है, हम प्रगति की रह से भटक जाते है, पाकिस्तान की क्या मजबूरी है जो वह युद्ध करता है वही जाने मगर हमला होने पर जबाब देना ही होगा ये सत्य है, मगर एक सत्य जो आज तक भारतीय जन मानस नही समझ पाया कि आखिर क्यों हम हर बार पाकिस्तान को माफ़ कर देते है? क्यों उन लोगो को जो भारतीय भूमि पर हमले के दोषी होते है, अफजल गुरू और कसाब जैसे लोगो को आखिर क्यों हम अदालतों के चक्कर लगवा कर समय बर्बाद करते है क्यों नही आखिर हम उन्हें फांसी पर लटका देते है? आखिर हम किस से डरते है क्या उस अमेरिका से जिसने 9/11 होने पर एक बड़ा युद्ध अंजाम दे डाला, जिसने कतई ये नही सोचा कि एक ओसामा बिन लादेन के लिए पूरे विश्व को युद्ध की भट्टी में नही झोंका जा सकता, उसने युद्ध किया बिना विश्व समुदाय की चिंता किये, और उस युद्ध का ही डर है कि अमेरिका मै फिर कोई 9/11 नही हुआ,
एक हम और हमारा भारत है आतंक वादी आते है, लाल किले पर हमला करते है, पकड़े जाने के बाबजूद जेलों में ऐसो आराम की जिन्दगी आज तक गुजार रहे होते है देहली, पूने, मालेगांव, गुजरात सहित पूरे भारत भर में बम ब्लास्ट होते है आतंकी फिर पकड़े जाते है फिर अदालतों के चक्कर में किसी को सजा नही होती और इसीका परिणाम है कि आतंकी मुम्बई में घुस कर 26/11को अंजाम देते है, सरे सडक हेमंत करकरे, अशोक कामते जैसे अनगिनत जांबाज शहीद होते है, वो आतंकी हमारे सामने ही अंधाधुन्द फायरिंग कर रहे होते है, और हम उन्हें गोली नही मारते जिन्दा पकड़ना चाहते है, क्यों? क्या इसलिए की हम साबित कर सके की इसके पीछे पाकिस्तानी हाथ है? अरे आखिर क्या होगा ये साबित करके भी जब हमारे अंदर इनको खत्म करने की इच्छा शक्ति ही नही है? पूरा देश इस बात को जनता है, विश्व समुदाय ने इस हमले का लाइव टेलीकास्ट देखा, सब जानते है कि कसाब पाकिस्तानी है मगर पाकिस्तान कसाब को पाकिस्तानी नागरिक मानने से ही इंकार करता है अब हम क्या करेंगे?
भारतीय कूट नीतिज्ञो को अब ज्यादा विश्व जनमत की इस बारे में परवाह करना छोडकर अमेरिका की तरह एक ठोस निर्णय लेना ही होगा की जो भी हमारे देश की ओर आँख उठाएगा वो मिट्टी में मिल जायेगा, जब हम पर युद्ध थोपे जा चुके है हमारे लाख चाहने के बाद भी शान्ति नही हुई तो अब एक युद्ध पूर्ण शान्ति के लिए हमे करना ही होगा क्योंकि खल जाने खल ही की भाषा ओर भय बिन प्रीत ना होए गुसांई जब तक आतंकियों के दिमाग में ये बात नही बैठेगी की भारत आतंकियों की कब्र गाह है तब तक भारत में शान्ति होना कदापि संभव नही है युद्ध किसी समस्या का हल नही है मगर पूर्ण शान्ति के लिए ये युद्ध आवश्यक है, जब शान्ति के सारे रस्ते बंद हो जाये तो कई बार युद्ध अपरिहार्य हो जाते है जसे महाभारत और रामायण के युद्ध शान्ति के लिए अपरिहार्य हो गये थे वैसे ही पाकिस्तान से अंतिम युद्ध अपरिहार्य हो गया है

***नागफनी के पेड़ तले कब प्यार की बाते होती है
युद्ध की बिभीश्का में, पत्नी, बहने, माताये रोती है,***
***पर युद्ध अगर सर पर आ जाये, राह कोई ना और दिखे,
तब यही हमारे भाल पर, विजय तिलक संजोती है***

जय हिंद जय भारत