बुधवार, अक्तूबर 20, 2010

***एक अर्थी एक डोली***



वन्दे मातरम बंधुयों,

हम कुछ दोस्तों ने मिलकर नव रात्रों मैं एक बेटी की शादी का आयोजन किया था जिस समय हम उस बेटी को विदा कर रहे थे उसी समय मेरे एक मित्र की माताजी की अर्थी निकाली जा रही थी ........ उसी समय मेरे दिमाग मैं ये कुछ विचार कोंधे थे ....जो शब्दों के रूप मैं आपके सामने पेश हैं............

एक अर्थी एक डोली, कल सामने टकरा गये,
देख कर एक दुसरे को, दोनों ही पूछा किये,
तुझमें और मुझमे, बता तो फर्क कैसा है?

तू भी काँधे पे जायेगी, मैं भी काँधे पे जाउंगी,
तुझे भी चार उठाएंगे, मुझे भी चार उठायेंगे,
तेरी रुखसत पे भी आंसू, मेरी रुखसत पे भी आंसू,
घर से जब हम निकलेंगे, लोग रोयेंगे रूलायेंगे,
तुझमें और मुझमे, बता तो फर्क कैसा है?

तेरे भी वक्त मेला है, मेरे भी वक्त मेला है,
तुझे जाना अकेला है, मुझे भी जाना अकेला है,
तुझे भी सजाया जाएगा, मुझे भी लोग सजायेंगे,
तुझे भी नम आँखों से विदा देंगे, मुझे भी मुश्किल से ले जायेंगे,
तुझमें और मुझमे, बता तो फर्क कैसा है?

फूल तुझ पर भी हैं, फूलों से मैं भी संवारी जाती हूँ
तू जीवन को जाती है, मैं जीवन से पार जाती हूँ,
तेरी भी साछी अग्नि है, मेरी भी साछी अग्नि है,
तेरे भी साथी हैं बिछड़े, मैं भी अपनों से बिछुड़ी हूँ,
तुझमें और मुझमे, बता तो फर्क कैसा है?

तुझे नया जीवन जीना है, मुझे भी नवजीवन को जाना है,
तुझे सजना को ख़ुशी देनी, मुझे माँ की गोदी सजाना है,
तू जिस घर मैं पहुंचेगी, बजेंगे ढोल नक्कारे,
मेरा जिस घर मैं जन्म होगा, नाचेंगे गायेंगे सारे,
तुझमें और मुझमे, बता तो फर्क कैसा है?