मंगलवार, अक्तूबर 19, 2010

***हम बेहद शर्मिंदा हैं***

वन्दे मातरम दोस्तों,

***मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा,***
***सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा***

15 अगस्त 1947 देश आजाद हुआ, वो शहीद जिन्होंने जंगे आजादी मैं अपने प्राणों की आहुति दी, बेहद खुश थे कि उनका बलिदान काम आया, वो जो कि आजादी के लिए जेलों में रहे, पुलिस की लाठियां खाई, वो जो कि किसी न किसी रूप मैं आजादी के आन्दोलन से जुड़े रहे, वो जो कि सभी भारत वासी थे बेहद खुश थे कि देश आजाद हुआ, उन सभी के बलिदानों का प्रति फल है की हमने आजादी की हवा में साँस ली, हमारा जन्म आजाद देश में हुआ, हम गुलाम नही कहलाये, मगर क्या ये वही आजादी है जिसकी कल्पना हमारे उन शहीदों ने की थी? क्या हम वास्तव मै आजाद हैं? क्या हम जंगे आजादी मैं हिन्दू मुसलमान सिख इसाई के रूप मैं शामिल हुए थे? क्या हम खालिस्तान गोरखा लेंड बोडो लेंड को आजाद करना चाहते थे? क्या यही था हमारी आजादी का स्वप्न? क्या वो शहीद ये सोच कर आजादी की लड़ाई लडे थे कि देश में पैदा होने वाला हर बच्चा विदेशी कर्जा लेकर पैदा होगा? क्या बच्चे पड़ लिख कर बेरोजगार घूमेंगे अपराधों में लिप्त होंगे? क्या देश की आधी आबादी स्लम मैं गुजरा करेगी? क्या मुट्ठी भर लोंगों को छोड़ कर अधिकांश आबादी पेट भरने के मकड जाल से बाहर नही निकल पायेगी? क्या हर चीज आज पैसे वालों के हाथ में होगी? क्या शासन सत्ता में बैठे लोग अपनी मन मर्जी से कानून बनाकर अपनी मन मर्जी से कानूनों के साथ खिलवाड़ करेंगे? क्या गरीब और गरीब होता जायेगा क्या? यही है शहीदों के सपनों का भारत?
आज शर्मसार है आसमान से देखती उन शहीदों की आत्मा, धिक्कारती है उन्हें क्या इसी आजादी के लिए वो शहीद हुए थे? उन शहीदों की आत्मा हमें धिक्कारती हुई कहती है.

***उठ गफलत से जाग जा, ओ हिन्दोस्तान के नौजवां,
वतन चला पतन की ओर तू सोया है नादान कहाँ.***