गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

अप्रत्याशित नहीं था नक्सलियों का हमला


छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 76 सुरक्षाकर्मियों की मौत देश के नक्सली हमले के इतिहास में सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है। वहीं नक्सली मामलों के जानकारों की माने तो यह हमला अप्रत्याशित नहीं है, क्योंकि नक्सल विरोधी अभियान के शुरू होने के बाद से नक्सली इस क्षेत्र में बड़ी घटना को अंजाम देकर केंद्र और राज्य सरकार को अपनी मजबूत स्थिति का अहसास कराने की फिराक में थे।

छत्तीसगढ़ के वन्य क्षेत्रों में करीब तीन दशक पहले शुरू हुआ नक्सलियों का आंदोलन आज इस राज्य के लिए नासूर बन गया है। नक्सलियों के लगातार बढ़ते हमले और इसमें मरने वाले पुलिस जवानों और आम आदमी की संख्या से राज्य में नक्सल समस्या का अंदाजा लगाया जा सकता है।

राज्य में पिछले लगभग पांच सालों में नक्सलियों ने जमकर उत्पात मचाया है और इस समस्या के कारण लगभग 15 सौ पुलिस कर्मियों, विशेष पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों की मृत्यु हुई है। मंगलवार को दंतेवाड़ा जिले में हुए इस नक्सली हमले ने इस समस्या का ऐसा वीभत्स रूप प्रस्तुत किया है जिससे निपटने के लिए अब सरकारों को नए सिरे से विचार करना होगा।

राज्य के नक्सल मामलों के जानकारों के मुताबिक मंगलवार को हुई घटना को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि नक्सली ऐसी घटना को अंजाम देने के फिराक में थे और वे पहले से इसकी तैयारी में थे। यह माना जा रहा है कि नक्सलियों ने इस हमले के लिए अपने प्रशिक्षित लोगों का उपयोग किया था क्योंकि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देना नक्सलियों के छोटे दल के बस की बात नहीं है। जानकारों का यह भी कहना है कि यह अक्सर देखने में आया है कि नक्सली जब भी वार्ता के लिए आगे कदम बढ़ाते हैं और युध्द विराम की बात कहते हैं तब वे इस दौरान अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करते हैं।

पिछले कुछ समय से नक्सलियों की तरफ से बातचीत और युध्द विराम की पेशकश और बाद में इससे पीछे हटने की घटना के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि नक्सली अब हमले तेज करेंगे और यह आशंका उस समय सच साबित हुई जब उन्होंने तीन दिन पहले उड़ीसा में पुलिस दल पर हमला कर 10 पुलिसकर्मियों को मार डाला।

वहीं कल दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने हमेशा की तरह अभियान में निकले उन जवानों पर हमला किया जो जंगली, पथरीले और उतार चढ़ाव वाले रास्तों से वापस आ रहे थे। नक्सलियों को इस बात की जानकारी थी कि लंबा सफर तय करने वाले सिपाही वापसी के दौरान थके हुए रहते हैं और ऐसे में उन्हें निशाना बनाना ज्यादा आसान होता है और वही हुआ। नक्सलियों के इस सुनियोजित हमले में सुरक्षा बल के जवान फंस गए और 76 सुरक्षा कर्मी मारे गए।

लगातार नक्सली हमले और भारी संख्या में सुरक्षाबल के जवानों के शहीद होने के बाद छत्तीसगढ़ राज्य शासन को यह जरूर महसूस हो रहा है कि अब नक्सलियों के साथ लड़ाई में रणनीति बदलने की जरूरत है।

राज्य के गृहमंत्री ननकी राम कंवर कहते हैं कि यह वक्त हालांकि गलती निकालने का नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि कहीं न कहीं इसमें चूक हुई है। कंवर कहते हैं कि राज्य में सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ समय में ज्यादा कामयाबी हासिल की और कई नक्सलियों को गिरफ्तार करने और अनेकों को मार गिराने में सफलता पाई। इस शुरूआती सफलता से राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर और दंतेवाड़ा जिले के नागरिकों को लगने लगा था कि क्षेत्र में जल्द शांति स्थापित होगी लेकिन यह भी सही है कि नक्सलियों के साथ लड़ाई छोटी नहीं है और सुरक्षा बल को इस लड़ाई को उतनी ही सजगता के साथ लड़ना होगा।

गृहमंत्री कहते हैं कि मंगलवार की घटना की जब पूरी जानकारी आएगी और इसकी समीक्षा होगी तो जरूरत होने पर निश्चित तौर पर रणनीति को भी बदलने पर विचार किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि नक्सली आज पूरे देश में अपने पैर पसार रहे हैं और पूरा देश इन लोकतंत्र विरोधी लोगों से परेशान है। यह केवल सुरक्षा बल या राज्य की लड़ाई नहीं बल्कि उन सभी की लड़ाई है जो लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं।

राज्य के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस घटना के बाद राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया और सरकार को बर्खास्त करने की मांग की।

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता रविंद्र चौबे कहते हैं कि राज्य सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र से जो भी मांग की वह पूरी हुई। राज्य को बल दिया गया तथा नए साजो सामान मुहैया कराए गए लेकिन इसके बावजूद एक हजार की संख्या में नक्सली किसी स्थान में हमला करने एकत्र होते हैं तो उसकी भनक खुफिया तंत्र को क्यों नहीं लग पाती।